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दिसंबर, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ठंडियों में आपकी स्किन मांगे केयर मोर

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हम महिलाओं के लिए अपने शरीर, त्वचा की देखभाल करना किसी  चैलेंज से कम नहीं।  ख़ासकर उन शहरों में जहाँ ठण्ड और गर्मी अपनी चरमसीम पर होती है।  ठंडियों में आपकी त्वचा आम मौसम की तुलना में ज्यादा केयर मांगती है और अगर आप इसकी अनदेखी कर रही हैं तो आपकी खूबसूरती में ग्रहण लग सकता है।  तो चलिए बताते हैं आपको कुछ आसान टिप्स जिससे आप की त्वचा ठंडियों में लगे खूबसूरत और आप हर  उम्र में  लगे जवां।  क्या करें - 👉सुबह नहाने के लिए अधिक हॉट वॉटर का चुनाव न करें।  इससे आपके स्किन के  अंदरूनी मॉइस्चर को नुक्सान पहुँचता है  जिससे आपकी स्किन और ज्यादा ड्राई होती है है।  👉 हमेशा  कम से कम समय में नहाएं।    👉नहाने के लिए  गुनगुना पानी चुनें। एकदम से हॉट वाटर से नहाना आपकी स्किन के इंटरनल मॉइस्चर को नुक़सान पहुंचाता है।  👉नहाने के पानी में आधा चम्मच ग्लिसरीन या फिर नारियल का ते ल मिला लें यह आपकी स्किन को रूखेपन से प्रोटेक्ट रखेगी। 👉साबुन के बजाये क्लींजिंग लोशन चुनें, धीरे धीरे मसाज करके ही अपनी स...

रिश्ते भी समय मांगते हैं....

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अक्सर हम औरतें अपने परिवार को खुश रखने या कहें परफेक्ट बनने के चक्कर में खुद को तो नजरअंदाज करते हैं पर साथ ही कई बार पति पत्नी के रिश्तों में भी अनजानी दूरियां जगह कर जाती हैं। इसी विषय में पढ़िए मेरी कहानी। शिप्रा मुझे लेट हो रहा है मैं जा रहा हूं, तुम रहने दो में कैंटीन से खाना खा लूंगा" कहते हुए राज अपना बैग, मोबाइल लेकर शिप्रा के किचन से ड्राइंग रूम में पहुंचने से पहले ही घर से निकल गया। शिप्रा ने दरवाज़ा बंद कर अपने शरीर को इस तरह सोफ़ा पर रखा मानो ना जाने कितने बोझ के संग वह बैठ रही हो। बोझ ही तो था अब पति पत्नी का ये रिश्ता, जहां पति राज अब सिर्फ सोने और नहाने ही घर आता और बाकी पूरे समय वह ऑफिस के काम में व्यस्त रहता था। शिप्रा और सोच में डूबती उससे पहले ही सासू मां की आवाज़ कि "बहु मेरा भी नाश्ता लगा दो " और फिर अपने बोझ को उतार शिप्रा फिर लग गई परिवारिक जिंदगी को सुचारू रूप से चलाने में... शिप्रा और राज की शादी को मात्र 5 साल ही गुजरे थे, जिसमें शिप्रा अपने 2साल के बेटे  की अच्छी मां, आधा शरीर लकवा ग्रस्त ससुर की अच्छी बहू, व कभी भी खुश ना हो पाने व...

मर्द को भी दर्द होता है...

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एक आस...

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एक आस लिए बैठी हूं एहसास लिए बैठी हूं, अपने ख्वाबों को पूरा करने का, अरमान लिए बैठी हूं। उम्मीद है वो सूरज भी जगमगाएगा, जिस दिन उसकी रोशनी में मेरा नाम भी दिख पाएगा, मैं हारी नहीं हूं अब भी, हराई गई कई बार, पर आज भी अपनी जीत का आग़ाज़ लिए बैठीं हूं। हौसला है पिता का, जस्बा मां ने दिया है, आगे बड़ने की ललकार लिए बैठी हूं। उम्मीद है दुनिया में सच्चाई ही जीते उसी जीत की पर्ची में बस अपना नाम लिए बैठी हूं, @ammazworld.blogspot.com

प्रकृति को बचा लो...

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शीर्षक देख कर तो आप समझ ही गए होंगे की बात हमारी प्रकृति की होगी.. मेरी सात साल की बेटी इन दिनों घर पर है, वही नहीं बल्कि कोविड -१९ की वजह से पूरा देश अपने अपने घरों में कैद है.  ऐसे  में दिन भर नयी नयी एक्टिविटीज उसके दिमाग में घूमती रहती हैं और तभी उसे ख़याल आया की क्यों न गार्डनिंग की जाये ? अब मैंने तो सख्त हिदायत दे रखी थी,कि"मै किसी भी एक्स्ट्रा एक्टिविटी के काम में तुम्हारी मदद नहीं करुंगी, अगर तुम्हे कोई नयी चीज जाननी है, तो खुद उसे कंप्यूटर पर पहले सर्च करो फिर किया करो"...फिर क्या था ? अगले दिन सुबह से ही नेचर की सर्च शुरू हो गयी।  ....व्हाट इस नेचर ? हाउ इस नेचर ? हाउ टू ग्रो प्लांट ? वेयर इस नेचर,  जैसे सर्च गूगल पर सर्च होने लगे।  अब सात साल के बच्चे से मै और उम्मीद भी क्या करती ? और इस अलग अलग सर्च के बाद उसने अचानक मुझसे        पूछा, "मम्मी ये हमारे नेचर को कोई प्रॉब्लम है क्या"? उसकी  बात सुनकर में स्तब्ध रह गयी.            उस समय के लिए तो मैंने ...

चार लोग....कौन से चार लोग?

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कितनी अजीब विडम्बना है, आज के जमाने में भी हम अपने लोगों की ख़ुशी या अपनी ख़ुशी से ज्यादा उन चार लोगों की सोच क्या होगी? इस बात से हम बहुत ज्यादा परेशान होते हैं। आज के जमाने से मेरा मतलब है आसमान में फाइटर जेट उड़ाती बेटियों से और कुछ तरक्की करते भारत से| मेरी ये कहानी भी कुछ उन्ही चार लोगों को तवज्जो देते परिवार की है जिसमें एक औरत की अहम भूमिका उन चार लोगों से बहुत ज्यादा प्रभावित है। भोपाल के एक माध्यम वर्गीय संयुक्त परिवार की मालकिन राधिका जी के लिए परिवार का सम्मान सबसे ऊपर था।  पति के देहांत के बाद दोनों बेटों को पाल पोसकर बड़ा करने का घमंड उनके चेहरे पर साफ़ झलकता था। राधिका जी हमेशा अपनी हर ख़ुशी को पाने से पहले उन चार लोगों के बारे में जरूर सोचतीं जिन्हें शायद उन्होंनें खुद कभी न देखा होगा। तभी तो कॉलोनी में बड़े गर्व से कहती फिरती थीं कोई उंगली नहीं उठा सकता उनपर। उम्र से कुछ 59 साल की राधिका जी 2 बेटों व बहुओं  मधु और मंजू  के साथ ही रहती थीं, संयुक्त और सुखी परिवार था पर चलती पूरे घर में राधिका जी की ही थी। राधिका जी- स...

आखिर वह क्या गलत करती है ?

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हम महिलाओं पर लगने वाले कुछ आम इलज़ाम लेकर बनी मेरी ये कविता पढ़े और बताएं आप कितना इत्तेफाक रखती है मेरे इस ख्याल से। ......  पापा की दुलारी थी , कभी न किसी से हारी थी , अगर यही सोच वह ससुराल में रखती है , तो वह क्या गलत करती है?  सासू माँ से सासू हटा लो , ससुरजी को पापाजी पुकारो , माँ - बाप समझो और सेवा करो,  फ़र्ज़ के समय बेटी और हक़ के समय बहु बना दी जाती है , इस बात पर क्यों ? कहकर जब वो सवाल करती है,  तो क्या गलत करती है ? घर से पूरे परिवार तक  पति के मोज़े से लेकर उसके रूमाल तक , जब सब कुछ वह खुद संवार कर रखती है , ऐसे में  खुद को सँवारने पर अगर वह पार्लर जाकर थोड़ा खर्चती है,  तो वह क्या गलत करती है ? तारीफ के लिए पड़ोस के शर्मा जी की मॉडर्न बहु चाहिए , और पति को दोस्तों की डिज़ाइनर पत्नी , ऐसे में अगर वह खुद को थोड़ा जीन्स में फिट करती है , तो वह क्या गलत करती है? उम्मीदों से पली  बढ़ी , लाडो पिता की रही परी , पर जब ससुराल में कोई इज़्ज़त न मिली , तो खुद की आत्मसम्मान के लिए अगर वह सर उठा के बात करती है,  तो वह क्या गलत करती है? हर कल...

शिकंजी और मैं...

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  मेरी जिंदगी ये🙃 ...मेरी जिंदगी वो,😉 पर शिकंजी सी ? आखिर कैसे ?      जबसे लॉक डाउन शरू हुआ है हम औरतों की जिंदगी में भूचाल सा आ रखा है....पूरी दुनिया बंद और हम चालू ...और चालू भी कैसे पूछों मत!किचन में सुबह,  दिन भर परिवार की फरमाईशें और रातें बच्चों की... आखिर चुटकु सोयेगा तभी तो में सो पाऊंगी...             मैं  मीनल ,,,वैसे तो दो बच्चो की माँ हूँ, पर संभालती चार बच्चे हूँ ....दरअसल सासू माँ का बच्चा भी मैं ही संभालती हूँ...हालांकि अब वो मेरे पति हैं , पर क्या कहूं ? सासू माँ ने उन्हे कभी बड़ा होने ही नहीं दिया ....पहले खुद उनकी बच्चे जैसे सेवा की फिर अपना 28 साल का बाबू शादी के फेरे करवा कर मेरी गोदी में डाल दिया ....ये थे, मेरे सासू माँ के बाबू।  वहीँ  शादी के 2 साल बाद मेरी पहली बेटी हुई, और हमने प्यार से उसका निक नाम बाऊ रखा. घर की आपा- धापी मेरी सही चल रही थी। बाबू और बाऊ तो मुझसे संभाले नहीं जा रहे थे , इसी बीच घर में कुछ ही दिनों बाद मेरे पति समीर बाजार से एक पालतू कुत्ता ...

एक गृहणी की चाय....☕🍵☕

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                    ओफ! हो रे ये ठण्ड, आज तो बड़ा मन है की बस इस ओस भरे सुहाने मौसम में प्यार की थोड़ी गरमाहट  हो, एक कॉलेज कपल की तरह एक दूसरे की नज़रों में हम घिरे रहे और हाथों में सुकून भरी चाय की प्याली हो। आज कुछ ऐसा हो की मेरी इस हरी- भरी बालकनी में  हमारे इश्क का मौसम आवारा हो......   छत से ओस में भीग चुके कपड़े उतारते - उतारते मैं  तो मानो इस मौसम में कहीं खो ही गयी थी, अगर पति देव आवाज़ न लगाते कि ''नहा चुका हूँ बनियान, टॉवेल पंहुचा दो मेरी रानी''.  रानी यह शब्द सुनते ही मानो पूरे शरीर में खून का दौरा डबल स्पीड में बड़ जाता है, क्योंकि  जब मुझे ये रानी बुलाते हैं ना तो  'नौक ' शब्द साइलेंट होता है और हम औरतों को सिर्फ रानी सुनाई देता है।  अभी लाई  कहते हुए सुबह के  7  बजे वाली उस रोमांटिक चाय  की आस लिए में किचन की ओर  बढ़  गई  पर  चाय की तलब  मेरी बरक़रार थी एक तरफ कूकर चढ़ाया और दूसरी तरफ चाय के लिए दूध...

ऑनलाइन क्लासेज बच्चों की ,आफत मम्मियों की..

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  कहने में  तो बड़ा शानदार लगता है ,की हमारे बच्चे ऑनलाइन क्लास ले रहे है।  पर क्या हकीकत में ये क्लासेस  शानदार  हैं  ? इस सवाल पर हर पेरेंट्स की अपनी राय है।  तो चलिए  छोटी सी कहानी के जरिये रूबरू होते  हैं ऑनलाइन क्लासेस  के नए सिस्टम और बच्चों की मानसिकता से।  ओह! शीट। ...''मम्मा आज लॉगिन में देर हो गई, और देखो ना , मेरा लॉगिन नहीं हो रहा। ''युव बेटा, देर नहीं बहुत देर हो गई है। ..11 बजे की क्लास थी। ''मम्मा में 11 .05 बजे  से लॉगिन कर रहा हूँ...और अब ११.१५  बज चुके हैं। ''रुक, मैं अपना काम रोक कर देखती हूँ। ....मां को युव के डेस्कटॉप तक आते - आते 11 .20 बज गए । .....''तभी कहती हूँ, 5  मिनट पहले लॉगिन किया करो''। ...और फाइनली    11 .25 पर युव की क्लास में एंट्री हो गई। मैडम ने युव को गुडमॉर्निंग विश किया और कहा ,''नाउ किड्स प्लीज नोट डाउन दी होम टास्क। 10  मिनट् मैडम ने होमेटास्क एक्सप्लेन किया और 5  मिनट डाउट क्लियर करके,  क्लास ओवर हो गयी.......

कन्यापूजन

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 जनमते ही बोझ उस नवजात पर बेटी शब्द का डालते हो, कई बार तो बिना बोझ उसे कोख में ही मारते हो, और फिर बड़ी शान से कहते हो कि आप कन्यापूजन को मानते हो..... बता दूं... आपको कन्या पूजन का हक नहीं। बेटियों के हक के लिए चलाते हैं मुहीम हज़ार, चार दिन की मोमबत्तियां और फिर चालीस दिन बाद वही हार, पर क्या बदल पाते हैं हम समाज का वो नजरिया, वो बेटियों पर लगी पाबंदी, वो ससुराल की बेढ़ियां, नहीं ना..... तो आप कन्या पूजन के हकदार नहीं। सही मायने में आप कन्या पूजन का हक तभी खो देते हैं जब लड़की के स्कर्ट से नापते हैं आप उसके संस्कारों का पैमाना, आपकी सोच जब तय करती है लड़की का घर से बाहर आना जाना... आप कहते हैं लड़कियां आबरू हैं घर की, तो क्यों बाहर आपके नजरों में रहता है किसी लड़की का आना जाना, किसी के घर की आबरू समझ बक्श दिया करें क्यों रखते हैं आप नजर किसी की आबरू पर... पर...पर...पर... जब घर में आकर लूट जाता है वह आबरू कोई, तो कहां जाता है आपका ये सो कॉल्ड ज़माना। इस दोहरी सोच को कन्या पूजन का हक नहीं। हर महिला में है दुर्गा का अंश, इसलिए पुरुषों को जनने और सृष्टि के संचार का हक वो...