प्रकृति को बचा लो...
शीर्षक देख कर तो आप समझ ही गए होंगे की बात हमारी प्रकृति की होगी.. मेरी सात साल की बेटी इन दिनों घर पर है, वही नहीं बल्कि कोविड -१९ की वजह से पूरा देश अपने अपने घरों में कैद है.
ऐसे में दिन भर नयी नयी एक्टिविटीज उसके दिमाग में घूमती रहती हैं और तभी उसे ख़याल आया की क्यों न गार्डनिंग की जाये ? अब मैंने तो सख्त हिदायत दे रखी थी,कि"मै किसी भी एक्स्ट्रा एक्टिविटी के काम में तुम्हारी मदद नहीं करुंगी, अगर तुम्हे कोई नयी चीज जाननी है, तो खुद उसे कंप्यूटर पर पहले सर्च करो फिर किया करो"...फिर क्या था ? अगले दिन सुबह से ही नेचर की सर्च शुरू हो गयी।
....व्हाट इस नेचर ? हाउ इस नेचर ? हाउ टू ग्रो प्लांट ? वेयर इस नेचर, जैसे सर्च गूगल पर सर्च होने लगे। अब सात साल के बच्चे से मै और उम्मीद भी क्या करती ? और इस अलग अलग सर्च के बाद उसने अचानक मुझसे पूछा, "मम्मी ये हमारे नेचर को कोई प्रॉब्लम है क्या"? उसकी बात सुनकर में स्तब्ध रह गयी.
उस समय के लिए तो मैंने उसे कोई और काम देकर टाल दिया पर यह सवाल दिन भर मुझे कचोटता रहा, क्या सचमुच नेचर को कोई प्रॉब्लम है क्या ? क्योकी जबसे लॉक डाउन शुरू हुआ है लगभग हर शहर का पॉलुशन ग्राफ सुधर गया है , जो रास्ते या इमारते हमे हमारी छत्त से नहीं दिखती थी वह अब साधारण बालकनी से काफी दूर तक साफ़ साफ़ दिखाई पड़ती है, सुबह की नींद आजकल पछियों की चहचाहट से खुलती है,
नीला आसमान जो सिर्फ हम किताबों में पड़ते थे अब उसे साफ़ साफ़ देख पा रहे है. हमारी गंगा जिसे करोडो के प्रोजेक्ट न साफ़ कर पाए वही गंगा के पानी को रिसर्च में पीने लायक बताया जा रहा है. ये सारी कहानी मात्र कुछ चंद दिनों की है. माना की कोविड के कहर से सारी दुनिया परेशान है पर हमारी प्रकृति के लिए तो यह किसी वरदान से कम नहीं. शायद प्रकृति भी हमसे कुछ चाहती है, कुछ मांगती है, हम उसे समझते तो है, पर अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते थे कहीं न कहीं ये लॉक डाउन प्रकृति के साथ की गयी छेड़छाड़ का ही नतीजा भी है. पर मन में डर ये भी है, कि प्रकृति का ये अच्छा समय कब तक उसका साथ देगा ? क्योंकि आज नहीं तो कल लॉक डाउन खुल जायेगा और हम सब नौकरी पेशा लोग अपनी गाड़ियों से सफर करने लगेंगे , मिल कम्पनिया अपना केमिकल आसमान और पानी दोनों में छोड़कर फिर उसके नेचुरल रंग से छेड़छाड़ शुरू कर देंगी, पछी डर के फिर अपने घोसलों में छुप जायेंगे, गंगा फिर सबके पाप धोने लगेगी , प्रकृति का हरा रंग एक बार फिर हरा नहीं रह जायेगा. पर आखिर कब तक शायद अब समय आ गया है, कि हमे अब खुद को प्रकृति की मांग के अनुसार बदलना होगा नाकि अपने मांग के अनुसार प्रकृति को, [ जो अब तक हम करते आये है ] ,,,वरना फिर कुछ सालो में कोवीड-१९ की तरह कोई और बीमारी आएगी और एक और नया सबक दे जाएगी पर हमे नहीं तब बारी हमारे बच्चों की होगी, सोचिये वो खतरनाक मंजर क्या और कैसा होगा ? .....इसलिए समय रहते हमे नेचर के इशारे को समझना होगा .
आप सभी से हाथ जोड़कर विनंती है प्रकृति के नकारात्मक इशारे को समझकर इसे सकारात्मक बनाने में सहयोग दें।
ammazworld@blogspot.com
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