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ट्रेंडी सी-सेक्शन...

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हे भगवान!क्या ज़माना आ गया है?आजकल की लड़कियों में तो दर्द सहने की छमता ही नहीं रही,  हमारे जमाने में हम घर का सारा काम भी करते थे, सास और पति के ताने भी सुनते थे और तब भी डिलीवरी के एक घंटे पहले तक काम ही कर रहे होते थे। पर आज की बहुएं तो प्रेगनेंट क्या हुईं अपने  पति को  उँगलियों पर नचाकर रखती हैं..... भगवान ही मालिक इस नई  पीढ़ी का, कहते हुए रुक्मा जी अपने कमरे में चली गयीं। ..  रुक्मा जी ये सारी बातें  ड्राइंग रूम में कह रही थीं पर उनकी बहु उपमा अपने कमरे में ही उन बातों को सुन सिसकियाँ भर रही थी। उपमा 7 महीने की प्रेगनेंट थी और पिछले हफ्ते के ही रूटीन चेक अप में उसकी गयनिकोलॉजिस्ट   ने कुछ कॉम्प्लीकेशन्स बताते हुए उसकी डिलीवरी   सिजेरियन ही होगी ऐसा कहा था। साथ ही बच्चा अभी से पेट में काफी नीचे है इसलिए बेड रेस्ट की सलाह दी थी।  इन बातों का रुक्मा जी को जबसे पता चला था तभी से उनका पारा चढ़ा हुआ था। जहाँ पहले बच्चे के आने की ख़ुशी होनी चाहिए थी वहां मात्र सिजेरियन की खबर ने पूरे परिवार में तनाव का माहौल पैदा कर दि...

औरतें भी खुश होती हैं क्या ?

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महिला और पुरुषों की सरंचना बिलकुल अलग है यह तो हम जानते ही हैं पर क्या आप जानते औरतें पुरुषों से ज्यादा खुश और संतुष्ट रहती हैं। ये मैं नहीं बल्कि , 160 देशों के लिए गैलप वर्ल्ड पोल द्वारा किये गए रिसर्च में पाया गया है। रिसर्च में यह कहा गया है कि औरतें मर्दों से ज्यादा खुश और संतुष्ट रहती हैं। ...अब रिसर्च है तो बात साबित भी है और हम भारतीय महिलाओं पर तो यह रिसर्च शत - प्रतिशत सही बैठती है। अगर कोई न्यूज़ रिपोर्टर माइक लेकर निकले और हम महिलाओं से पूछे की "आपको किस बात से ख़ुशी मिलती है "तो  जवाब क्या होगा?  इसी सवाल की तलाश में जब मैं निकली तो बात लंबी हो गयी और मन में न जाने कितनी उठा पटक शुरू हो गयी। ..जवाब की बेचैनी ने पहले तो खुद को ही आईने के सामने खड़ा कर सवाल कर लिया। ....जवाब समझ नहीं आया कि  आखिर कौन सी ऐसी बात है जो मुझे खुशियां देती है। ... शादी शुदा हूँ और पतिव्रता नारी भी,तो पहला ख्याल तो पति परमेश्वर का ही आया। .... क्योंकि शादी के बाद हम महिलाओं की  पूरी खुशियां परिवार के आसपास  घूमकर ही रह जाती है।   शाद...

चार लोग....कौन से चार लोग?

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कितनी अजीब विडम्बना है, आज के जमाने में भी हम अपने लोगों की ख़ुशी या अपनी ख़ुशी से ज्यादा उन चार लोगों की सोच क्या होगी? इस बात से हम बहुत ज्यादा परेशान होते हैं। आज के जमाने से मेरा मतलब है आसमान में फाइटर जेट उड़ाती बेटियों से और कुछ तरक्की करते भारत से| मेरी ये कहानी भी कुछ उन्ही चार लोगों को तवज्जो देते परिवार की है जिसमें एक औरत की अहम भूमिका उन चार लोगों से बहुत ज्यादा प्रभावित है। भोपाल के एक माध्यम वर्गीय संयुक्त परिवार की मालकिन राधिका जी के लिए परिवार का सम्मान सबसे ऊपर था।  पति के देहांत के बाद दोनों बेटों को पाल पोसकर बड़ा करने का घमंड उनके चेहरे पर साफ़ झलकता था। राधिका जी हमेशा अपनी हर ख़ुशी को पाने से पहले उन चार लोगों के बारे में जरूर सोचतीं जिन्हें शायद उन्होंनें खुद कभी न देखा होगा। तभी तो कॉलोनी में बड़े गर्व से कहती फिरती थीं कोई उंगली नहीं उठा सकता उनपर। उम्र से कुछ 59 साल की राधिका जी 2 बेटों व बहुओं  मधु और मंजू  के साथ ही रहती थीं, संयुक्त और सुखी परिवार था पर चलती पूरे घर में राधिका जी की ही थी। राधिका जी- स...