चार लोग....कौन से चार लोग?
कितनी अजीब विडम्बना है, आज के जमाने में भी हम अपने लोगों की ख़ुशी या अपनी ख़ुशी से ज्यादा उन चार लोगों की सोच क्या होगी? इस बात से हम बहुत ज्यादा परेशान होते हैं। आज के जमाने से मेरा मतलब है आसमान में फाइटर जेट उड़ाती बेटियों से और कुछ तरक्की करते भारत से| मेरी ये कहानी भी कुछ उन्ही चार लोगों को तवज्जो देते परिवार की है जिसमें एक औरत की अहम भूमिका उन चार लोगों से बहुत ज्यादा प्रभावित है।
भोपाल के एक माध्यम वर्गीय संयुक्त परिवार की मालकिन राधिका जी के लिए परिवार का सम्मान सबसे ऊपर था। पति के देहांत के बाद दोनों बेटों को पाल पोसकर बड़ा करने का घमंड उनके चेहरे पर साफ़ झलकता था। राधिका जी हमेशा अपनी हर ख़ुशी को पाने से पहले उन चार लोगों के बारे में जरूर सोचतीं जिन्हें शायद उन्होंनें खुद कभी न देखा होगा। तभी तो कॉलोनी में बड़े गर्व से कहती फिरती थीं कोई उंगली नहीं उठा सकता उनपर। उम्र से कुछ 59 साल की राधिका जी 2 बेटों व बहुओं मधु और मंजू के साथ ही रहती थीं, संयुक्त और सुखी परिवार था पर चलती पूरे घर में राधिका जी की ही थी।
राधिका जी- सुनो मधु आज आलू भुजिया बना लो|
मंजू- पर माँ आज तो बच्चों की फरमाईश थी पनीर की सब्जी बनाने की।
राधिका जी - हां पर अब पनीर घर में नहीं और कोई मर्द भी नहीं है, जो बाजार से जाकर पनीर ले आए। अब क्या घर की बहु बेटियां लाला के दूकान जाएंगी पनीर लाने तो लोग क्या कहेंगे?
राधिका जी के घर के बच्चे 10वीं क्लास के बाद ही दिल्ली के एक हॉस्टल में रहकर ही पढ़ रहे थे| अक्सर तीनों बच्चे छुट्टियों में आते और 8-10 दिन रहकर चले जाते थे| पर इस बार कोरोना की वजह से छुट्टियां थोड़ी लम्बी हो गयीं और बच्चों को यहीं रहना पड़ा। इसी बीच राधिका जी की 25 वर्षीय पोती रिदिमा बोली "क्या दादी पनीर ही तो लाना है, कौन सा दूल्हा खरीद कर लाना है| लाओ माँ पैसे दो मैं ले आती हूँ"|
दादी माँ "ए रिदिमा यहाँ शहरों का नाटक नहीं चलता, ये फूर्ति जाकर अपने पति के घर दिखाना| मैं कहती थी मंजू बेटों के साथ बेटी को पढ़ने ना भेजो पर नहीं मानी, भेजे हो पढ़ने देखो क्या सीख रही है। अब इसे यहीं रखो थोड़ा शर्म और लाज करना सिखाओ"|
रिदिमा दादी माँ के रवैये से तो वाकिफ थी, पर अब वो बड़ी हो गयी थी और उसके लिए यह कैद बिलकुल असहनीय था| ख़ासकर तब जब वह खुद एक डॉक्टर बनने वाली थी।
थोड़ी देर बाद मंजू कमरे में पहुंची तो रिदिमा रो रही थी।
मंजू- कोई बात नहीं बेटा दादी की तो आदत है तू क्यों परेशान होती है तुझे कौन सा यहाँ रहना है ?
रिदिमा- पर माँ आपको और चाची को तो रहना है न, आप लोग कब अपनी जिंदगी जिएंगी, क्या आपका मन नहीं करता अपनी पसंद की चीजे करने का।
मंजू - हां तो बेटा दादी माँ कहाँ हमारे पहनने, खाने ,रहने में कोई कमी करती हैं?
रिदिमा - हां तो अच्छे कपड़े आपको इसलिए पहनाती हैं ताकि कॉलोनी में सब ये कहें की आपकी सास आपको कितना खुश रखती हैं , दुकान से काजू बादाम तो बहुओं के नाम से ही लाती हैं पर आप दोनों कितना खाते हो ये तो आप जानती ही हैं पापा चाचा और बाहर वालों के सामने आप लोगों से कितने प्यार से बात करती हैं ये सब हम बच्चों ने बचपन से देखा है, माँ आप और चाची कम से कम अपने पतियों से तो अपनी बात कही सकती हैं।
मंजू - तो तू क्या समझती है रिदिमा, तेरे पापा को कुछ नहीं पता, सबकुछ पता है उन्हें पर वो मुझे यही समझाते हैं कि "अगर मैं तेरी तरफ से बोलूंगा तो सब कहेंगे विधवा माँ को बुढ़ापे में बेटा जोरू का गुलाम बनकर सता रहा है" और बस सब वही रुक जाता है रिदिमा मेरा भी दम घुटता है यही सोचती हूँ की अगर छोटी का साथ न होता तो में कैसे रहती इस कैद खाने में।
रिदिमा - माँ आप सिर्फ अपने साथ नहीं बल्कि चाची के साथ भी गलत कर रही हैं देखा जाए तो आप बड़ी होकर सह रहीं हैं इसलिए उन्हें भी सहना पड़ रहा है और इसलिए शायद मुझे भी और कल को जो आपकी आने वाली बहु होगी उसे भी पर सोचिये अगर वो पराये घर की लड़की आपके इन पुराने नियमों में खुद को ना बांध पायी तो आप लोग उन चार लोगों को खुश करने के चक्कर में उस लड़की के ना जाने कितने सपने मारकर उसे इस घर में दुखी रखोगे , क्या ये सोचा कभी माँ आपने?
मंजू के पैरों तले से मानो जमीं खिसक गयी थी रिदिमा के एहसास दिलाने पर उसे अच्छी तरह समझ आ गया था की जुर्म करने वाले से ज्यादा गुनहगार जुर्म सहने वाला होता है।
अगले दिन सुबह मंजू ने अपने मॉर्निग वाक वाले जूते तो पहने पर छत पर जाने की बजाये घर का मेन गेट खोलने लगी। गेट की आवाज़ सुनकर राधिका दौड़ी बाहर आयी तो मंजू को निकलते देखा पर राधिका के बुलाने तक मंजू बाहर जा चुकी थी। राधिका ने मधु को जोर से आवाज़ लगायी मधु घबराते हुए एक आवाज़ पर सामने खड़ी थी।
राधिकाजी - कहाँ गयी ये बाहर मुझे बिना पूछे ?
मधु - नहीं पता माँ जी पर दीदी कल बता रहीं थी की डॉक्टर ने मॉर्निग वाक करने को कहा है।
राधिका - हां तो छत पर करती तो थी फिर बाहर अकेले जाने की क्या जरुरत पड़ गयी चार लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे मेरे बारे में और गुस्से में अपने कमरे में चली गयी।
फिर शाम को मधु मंजू को लेकर सब्जी लेने जाने लगी राधिका जी ने फिर टोका "ये चल क्या रहा है तुम्हारा मंजू बहु तुम्हारे भी बेटी की तरह पर निकल आएं हैं जानती भी हो चार लोग क्या कहेंगे मेरे बारे में जब तुम दोनों इस तरह अपने मर्दों के बिना बाहर जाओगी तो ?"
मंजू - आपको पता है माँ कल मैं यही पता करने बाहर गयी थी बगल वाली मिश्राइन अपनी बहु के साथ सरकारी पार्क में योगा कर रही थीं उनकी बहु ही सीखा रही थीं मुझे देख हैरान थीं बोलीं "कैसे आज राधिका के कैद से तुम छूट कर आयी , न जाने कैसा दिल है उस कठोर राधिका का जो अपनी बहुओं को कैदी की तरह रखती है तुम दोनों बहुएं तो हीरा हो हीरा "
जब मैं घर की तरफ आ रही थी तो लाला की दूकान पर गुप्ताइन खड़ी थीं उन्हें देख मैंने उनके पैर छुए तो वह बोल पड़ीं "अरे बेटा हमने तो सुना था कि एक औरत ही औरत की दुश्मन होती है पर राधिका और तुम बहुओं के रिश्ते को देख मान गयी मैं तो, कि ये सच है । अरे उसे भी जमाने के साथ बदलना चाहिए"
मुझे बहुत दुःख हुआ माँ, कि जिसे हम पूजते हैं उसके लिए बाहर वाले ऐसा सोचते हैं। मैं जानती हूँ माँ आप हमें बहुत प्यार करती हैं पर आप ये सब सिर्फ उन चार लोगों के लिए करती हैं जो असल में हैं ही नहीं वो हैं तो बस आपके दिमाग में हैं और अगर वो हैं तो आपने सुन ही लिया की वो आपके बारे में क्या सोचते हैं।
इसी बीच रिदिमा भी बोल पड़ी "दादी आप सिर्फ हम सब को नहीं खुद को भी सिर्फ उन चार लोगों के लिए कई बंदिशों में बाँध रखे हो, जो आपके लिए भी सही नहीं हैं, आप भी खुलकर अपना जीवन जीएं आज क्योंकि जिंदगी दोबारा नहीं मिलती। अब तो आपने सुन ही लिया की जिन चार लोगों की आपको चिंता थी वो आपको लेकर क्या सोचते हैं और फिर यही दुनिया है वो अपने तरीके से ही सोचेंगे नाकि आपके हिसाब से। तो उनके लिए हम अपने रिश्ते, समय और खुशियां क्यों बर्बाद करें।
राधिका जी आप चुप थी और शायद बदलते समय के मांग को समझ भी रही थीं|
अगले दिन राधिका जी बड़ी शान से मंजू और मधु के साथ बाजार गईं सब्जी लेने, उनकी चाल और चेहरे की रौनक पूछ रही थी|
कौन हैं वो चार लोग?
@ammazworld.blogspot.com
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