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हे भगवान!क्या ज़माना आ गया है?आजकल की लड़कियों में तो दर्द सहने की छमता ही नहीं रही,  हमारे जमाने में हम घर का सारा काम भी करते थे, सास और पति के ताने भी सुनते थे और तब भी डिलीवरी के एक घंटे पहले तक काम ही कर रहे होते थे। पर आज की बहुएं तो प्रेगनेंट क्या हुईं अपने  पति को  उँगलियों पर नचाकर रखती हैं..... भगवान ही मालिक इस नई  पीढ़ी का, कहते हुए रुक्मा जी अपने कमरे में चली गयीं। ..  रुक्मा जी ये सारी बातें  ड्राइंग रूम में कह रही थीं पर उनकी बहु उपमा अपने कमरे में ही उन बातों को सुन सिसकियाँ भर रही थी। उपमा 7 महीने की प्रेगनेंट थी और पिछले हफ्ते के ही रूटीन चेक अप में उसकी गयनिकोलॉजिस्ट   ने कुछ कॉम्प्लीकेशन्स बताते हुए उसकी डिलीवरी   सिजेरियन ही होगी ऐसा कहा था। साथ ही बच्चा अभी से पेट में काफी नीचे है इसलिए बेड रेस्ट की सलाह दी थी।  इन बातों का रुक्मा जी को जबसे पता चला था तभी से उनका पारा चढ़ा हुआ था। जहाँ पहले बच्चे के आने की ख़ुशी होनी चाहिए थी वहां मात्र सिजेरियन की खबर ने पूरे परिवार में तनाव का माहौल पैदा कर दि...

रिश्ते भी समय मांगते हैं....

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अक्सर हम औरतें अपने परिवार को खुश रखने या कहें परफेक्ट बनने के चक्कर में खुद को तो नजरअंदाज करते हैं पर साथ ही कई बार पति पत्नी के रिश्तों में भी अनजानी दूरियां जगह कर जाती हैं। इसी विषय में पढ़िए मेरी कहानी। शिप्रा मुझे लेट हो रहा है मैं जा रहा हूं, तुम रहने दो में कैंटीन से खाना खा लूंगा" कहते हुए राज अपना बैग, मोबाइल लेकर शिप्रा के किचन से ड्राइंग रूम में पहुंचने से पहले ही घर से निकल गया। शिप्रा ने दरवाज़ा बंद कर अपने शरीर को इस तरह सोफ़ा पर रखा मानो ना जाने कितने बोझ के संग वह बैठ रही हो। बोझ ही तो था अब पति पत्नी का ये रिश्ता, जहां पति राज अब सिर्फ सोने और नहाने ही घर आता और बाकी पूरे समय वह ऑफिस के काम में व्यस्त रहता था। शिप्रा और सोच में डूबती उससे पहले ही सासू मां की आवाज़ कि "बहु मेरा भी नाश्ता लगा दो " और फिर अपने बोझ को उतार शिप्रा फिर लग गई परिवारिक जिंदगी को सुचारू रूप से चलाने में... शिप्रा और राज की शादी को मात्र 5 साल ही गुजरे थे, जिसमें शिप्रा अपने 2साल के बेटे  की अच्छी मां, आधा शरीर लकवा ग्रस्त ससुर की अच्छी बहू, व कभी भी खुश ना हो पाने व...