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कन्यापूजन

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 जनमते ही बोझ उस नवजात पर बेटी शब्द का डालते हो, कई बार तो बिना बोझ उसे कोख में ही मारते हो, और फिर बड़ी शान से कहते हो कि आप कन्यापूजन को मानते हो..... बता दूं... आपको कन्या पूजन का हक नहीं। बेटियों के हक के लिए चलाते हैं मुहीम हज़ार, चार दिन की मोमबत्तियां और फिर चालीस दिन बाद वही हार, पर क्या बदल पाते हैं हम समाज का वो नजरिया, वो बेटियों पर लगी पाबंदी, वो ससुराल की बेढ़ियां, नहीं ना..... तो आप कन्या पूजन के हकदार नहीं। सही मायने में आप कन्या पूजन का हक तभी खो देते हैं जब लड़की के स्कर्ट से नापते हैं आप उसके संस्कारों का पैमाना, आपकी सोच जब तय करती है लड़की का घर से बाहर आना जाना... आप कहते हैं लड़कियां आबरू हैं घर की, तो क्यों बाहर आपके नजरों में रहता है किसी लड़की का आना जाना, किसी के घर की आबरू समझ बक्श दिया करें क्यों रखते हैं आप नजर किसी की आबरू पर... पर...पर...पर... जब घर में आकर लूट जाता है वह आबरू कोई, तो कहां जाता है आपका ये सो कॉल्ड ज़माना। इस दोहरी सोच को कन्या पूजन का हक नहीं। हर महिला में है दुर्गा का अंश, इसलिए पुरुषों को जनने और सृष्टि के संचार का हक वो...