चार लोग....कौन से चार लोग?
कितनी अजीब विडम्बना है, आज के जमाने में भी हम अपने लोगों की ख़ुशी या अपनी ख़ुशी से ज्यादा उन चार लोगों की सोच क्या होगी? इस बात से हम बहुत ज्यादा परेशान होते हैं। आज के जमाने से मेरा मतलब है आसमान में फाइटर जेट उड़ाती बेटियों से और कुछ तरक्की करते भारत से| मेरी ये कहानी भी कुछ उन्ही चार लोगों को तवज्जो देते परिवार की है जिसमें एक औरत की अहम भूमिका उन चार लोगों से बहुत ज्यादा प्रभावित है। भोपाल के एक माध्यम वर्गीय संयुक्त परिवार की मालकिन राधिका जी के लिए परिवार का सम्मान सबसे ऊपर था। पति के देहांत के बाद दोनों बेटों को पाल पोसकर बड़ा करने का घमंड उनके चेहरे पर साफ़ झलकता था। राधिका जी हमेशा अपनी हर ख़ुशी को पाने से पहले उन चार लोगों के बारे में जरूर सोचतीं जिन्हें शायद उन्होंनें खुद कभी न देखा होगा। तभी तो कॉलोनी में बड़े गर्व से कहती फिरती थीं कोई उंगली नहीं उठा सकता उनपर। उम्र से कुछ 59 साल की राधिका जी 2 बेटों व बहुओं मधु और मंजू के साथ ही रहती थीं, संयुक्त और सुखी परिवार था पर चलती पूरे घर में राधिका जी की ही थी। राधिका जी- स...