शिकंजी और मैं...


 

मेरी जिंदगी ये🙃 ...मेरी जिंदगी वो,😉 पर शिकंजी सी ? आखिर कैसे ?

     जबसे लॉक डाउन शरू हुआ है हम औरतों की जिंदगी में भूचाल सा आ रखा है....पूरी दुनिया बंद और हम चालू ...और चालू भी कैसे पूछों मत!किचन में सुबह,  दिन भर परिवार की फरमाईशें और रातें बच्चों की... आखिर चुटकु सोयेगा तभी तो में सो पाऊंगी...

            मैं  मीनल ,,,वैसे तो दो बच्चो की माँ हूँ, पर संभालती चार बच्चे हूँ ....दरअसल सासू माँ का बच्चा भी मैं ही संभालती हूँ...हालांकि अब वो मेरे पति हैं , पर क्या कहूं ? सासू माँ ने उन्हे कभी बड़ा होने ही नहीं दिया ....पहले खुद उनकी बच्चे जैसे सेवा की फिर अपना 28 साल का बाबू शादी के फेरे करवा कर मेरी गोदी में डाल दिया ....ये थे, मेरे सासू माँ के बाबू। 


वहीँ  शादी के 2 साल बाद मेरी पहली बेटी हुई, और हमने प्यार से उसका निक नाम बाऊ रखा. घर की आपा- धापी मेरी सही चल रही थी। बाबू और बाऊ तो मुझसे संभाले नहीं जा रहे थे , इसी बीच घर में कुछ ही दिनों बाद मेरे पति समीर बाजार से एक पालतू कुत्ता ले आए... समीर को पालतू जानवरों से बहुत प्यार था...और घर में कोई उसे कुत्ता नहीं बुला सकता था, समीर की पसंदीदा हेरोइन करीना थी, इसलिए उसका नाम प्यार से बेबो रख लिया।

 ..यकीन मानिए जितना प्यार मेरी सासू माँ अपने बाबू से करती हैं, उससे मात्र एक सरसो भर ही , कम प्यार मेरे पति अपने बेबो से करते हैं ....और इन सबके  बीच मेरी पहली बेटी बाऊ ....अब मेरी बेटी को तो में डाट फटकार लगा सकती थी.. पर बेबो को क्या मजाल की मैं  घूर कर भी देख पाती...समीर  मेरी क्लास लगा देते थे....जैसे तैसे मेरी जिंदगी 4 साल से  बाबू , बाऊ और बेबो के साथ खट्टी - मीठी गुजर रही थी, कि हमारी जिंदगी में एक चटपटी गुड न्यूज आई। 

          अब समय था मेरी दूसरी प्रेगनेंसी का यानी की  मेरे घर में चौथे बच्चे के आगमन का ....हर महिला की तरह मैं  भी अपने  सातवे महीने में आते आते घर के कामों  से थक जाती थी.  मैंने एक दिन समीर से कह दिया की अब ये जिम्मेदारियां मुझसे नहीं संभलती। वैसे समीर बहुत अच्छे पति और पिता थे. पर क्या मजाल की वो एक गिलास उठाकर यहाँ से वहाँ रख देते। 


दरअसल  गलती उनकी भी नहीं थी. उनकी जिंदगी में ये सारे काम उनकी माँ ने किए उन्हे कभी मदद के तौर पर भी कोई काम करने को नहीं कहा। समीर ने अपनी पढ़ाई भी परिवार से दूर रहकर की थी। मैंने शादी के बाद समीर की आदतों को सुधारने की कोशिश की पर सासु माँ का  सिखाया समीर की जिंदगी से में जल्दी मिटा  नहीं पाई। ...मेरी तबियत के बारे में सुनकर समीर ने अपनी माँ को बुला लिया ।

समीर की माँ  यकींन  मानिए दिल से प्लैटिनम थी ...पर मेरी सासु माँ मेरे लिए बस सोना (गोल्ड )....परेशान तो मुझे नहीं करती थीं, पर उनके रहते समीर को कोई परेशानी न होने  पाए, इस बात का वो पूरा ख्याल रखतीं थीं... समीर का खाना , टिफ़िन , कपड़े, ऑफिस की जरुरी कागजात सब कुछ बड़े जतन से  रखती थीं ....वो मेरा भी ख्याल रखती पर मेरे कामो के लिए हमेशा वो मीणा को भेजती। मीणा मेरी बेटी की देखभाल के लिए रखी गई थी। 


बाऊ को स्कूल, पार्क ले जाना आदि कामों के लिए.. सासू माँ उम्र की वजह से अपने पैरो से थोड़ा कमजोर थी.. पर बस पैरों से  ....किसी तरह समय बिता और मेरी डिलीवरी का टाइम आ गया ...मैं दूसरी बार माँ बनने वाली थी, तो दर्द और जरुरत की चीजों से वाकिफ थी, मैंने मीणा के साथ मिलकर अपना हॉस्पिटल का बैग तैयार कर लिया था...और इन्ही दिनों में मेरे बच्चे से पहले दुनिया में कोरोना की दस्तक हो गई ...मैंने अस्पताल में अपने बेटे को जन्म  दिया और हमे २ दिन में ही अस्पताल से छुट्टी मिल गई।

पर जब हम घर आए  तो पता चला, कि मीणा अब नौकरी पर नहीं आएगी...लॉक डाउन की वजह से मीणा के माता पिता का काम बंद हो गया था, और वो अपने गांव  की ओर निकल चुके हैं....मेरे तो कुछ समझ न आए ...सासू माँ तो थीं ...पर उन्हे अपने बाबू की सेवा से फुर्सत मिलेगी तब तो वो हम लोगों के लिए कुछ करतीं...और अभी तो मुझे भी आराम की जरुरत थी। समीर मुझे समझा तो रहे थे,''सब ठीक  हो जायेगा'' पर कैसे? ये उन्हें भी नहीं पता था।

 मुझे परेशान देख समीर किचन की ओर मुड़े और मेरे लिए शिकंजी बना कर लाए  ....ये देख मैं  तो चौक गई! शादी के बाद पैसो के अलावा समीर ने पहली बार मेरे हाथों में कुछ थमाया था वो भी अपने हाथों से बनाकर । ये देख मुझसे ज्यादा बड़ा झटका लगा था, मेरी सासू माँ को।


 ..उस समय मेरे अंदर जा रही शिकंजी मुझे अपनी जिंदगी के हर स्वाद से रूबरू करा रही थी...समीर मुझे शिकंजी का पानी लग रहे थे...उनके इस काम पर मुझे इतना प्यार आ रहा था, की मानो मैं उन्हे गट-गट कर पीती चली  जाऊं...शिकंजी की मिठास मेरी जिंदगी में मेरे बेटे के आने की ख़ुशी का एहसास दिला रही थी...उसमें पड़ी बर्फ की ठंडक मेरी बेटी की मासूमियत सी थी, उसकी  एक मुस्कान से भी  मुझे इतनी ही ठंडक मिलती थी ...शिकंजी में डाले भुने जीरे का रंग मुझे बेबो के घने बालों की याद दिला रहा था ...और शिकंजी बनाने  में लगने वाली सबसे जरुरी चीज नींबू ....समझ तो गए ही होंगे आप.......मेरी खट्टी - मिट्ठी सासू माँ, जो बिलकुल उतनी ही हमारे लिए जरुरी थीं जितना शिकंजी में नींबू  ......और जब शिकंजी खतम हुई तो एहसास हुआ की समीर और सासू माँ ने मिलकर सारे काम बाट लिए थे.. और मुझे काम मिला था, उन दोनो के कामों की निगरानी करने का।

  .....यही थी मेरे परिवार की चटपटी शिकंजी जैसी राहत देने  वाली कहानी ..... जो  हर परीवार में होती है। निर्भर आप पर करती है की आप उसे क्या समझ कर पीते हैं।अब जब पीना ही है, तो  मेरी मानिए तो चटपटी शिकंजी ही समझिये।  मानसिक , शारीरिक दोनो को राहत और ठंडक मिलेगी।

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