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प्यार वाला महीना

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प्रकृति का अस्तित्व

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इस संसार में जो कुछ भी है वह अपनी अहमियत रखता है फिर चाहे वह एक कंकड़ हो या शाख से टूटा कोई सूखा पत्ता...बेजान होने के नाते हम उसे फालतू समझते हैं...उसी तरह हमारी प्रकृति में मौजूद एक एक कण अपना वजूद रखता है उसका होना जरूरी है बस इसलिए वो है भले उसके होने की वजह इंसान ना देख पाता हो...और इसी अनदेखी की वजह है आज का उत्तराखंड का हादसा.... इंसान इस दौड़ में है कि इस पूरी दुनिया में जहां भी हो बस वही हो..फिर चाहे उसके लिए उसे, जंगल काटने पड़े, पहाड़ तोड़ने पड़े, या नदियां पाटनी पड़े...अपनी लालच को तरक्की का नाम देकर चांद और आसमान तक पहुंचते इंसान को रुककर सोचना होगा... यह समझना होगा की इस धरातल पर जितना जरूरी वह खुद है उतना ही ज़रूरी हर कण कण है...आप प्रकृति से छेड़छाड़ करोगे तो वह आपकी कंप्लेन करने आपके खरीदे हुए पुलिस स्टेशन नहीं जायेगी मेरे भाई, प्रकृति के अस्तित्व को चोट पहुंचाने की कोशिश करोगे तो यही होगा जो आज उत्तराखंड में हुआ... और ये तो शुरुवात...आप अपना नही बिगाड़ रहे आप बिगाड़ रहे हो अपने भविष्य का...क्या देकर जाओगे अपने बच्चों को सूखी नदियां, बदबूदार त...

कपड़ो से नपते संस्कार..

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"आहा..... माँ आज तो मैं बहुत ही उत्सुक हूँ मेरे स्केचेज़ प्रोजेक्ट के लिए सेलेक्ट हो गए हैं| आपको पता तो है मैं कितनी उम्मीदों के साथ यहाँ आयी थी" और अब माही का गला भर आया बोलते बोलते। माँ- हां गुड्डो मुझे पता है मेरी बेटी बहुत ही लायक है एक दिन जरूर मेरा नाम रोशन करेगी और अब रोना नहीं सिर्फ आगे बढ़ना है तुझे चल अपनी तैयारी कर कहते हुए किरण ने फ़ोन रख दिया।  किरण सुबह का काम समेटते हुए अपनी चाय लेकर बैठी और बेटी माही  की तरक्की में खुद को ढूंढने लगी। 20 साल पहले की किरण  बहुत ही आशावादी नयी सोच से भरी हमेशा कुछ नया करने को आतुर जिंदगी में  बहुत मशहूर होने की ख्वाहिश रखती थी। किरण मुस्कुराती हुई मानो खुद की चाय की प्याली से ही बतियाने लगी ''मुझे पता है जिंदगी एक ही बार मिलती है और इसे मैं खुलकर जीना मेरा सपना है  मैं शादी के बाद ये करुँगी , वो करुँगी कहते कहते आँख भर आई किरण की" दरअसल किरण शादी के बाद अपने पारिवारिक जिम्मेदारियों में इस तरह उलझी की फिर उसके सपने ही बदल गए , समय की कमी उसकी उत्सुकता को मारती दिखी और फिर सबसे जरुरी...

हां मैं भीड़ का किसान हूं....

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मुद्दा ये नहीं की मैं किसान हूं बात सिर्फ इतनी है कि  ये देश मेरा और मैं इस देश का अभिमान हूं मुद्दा ये नहीं की मेरी जीत हो बात सिर्फ इतनी है कि मेरी समझ से क्यों परे है मेरी ही बात हित की मुद्दा ये नहीं कि  सरकार अडिग है बात पर अपनी बात सिर्फ ये है  कि उन्हें हमसे ज्यादा हमारी परवाह क्यों इतनी मुद्दा ये नहीं की भीड़ है कुछ दिन कि छट जायेगी ही बात सिर्फ इतनी सी है  कि अब हर भीड़ में एक किसान है। मुद्दा ये नहीं कि मुद्दा सुलझने को तैयार नहीं, बात सिर्फ इतनी है कि सरकारी दहेज का वजन ना कम हो जाए कहीं। मुद्दा ये है  अब जीत की आगाज़ से शुरू आंदोलन का जीत से ही अंत होगा अनाज का मान बड़े अब यही हर किसान का अभिमान होगा। मुद्दा ये नहीं की मैं किसान हूं बात सिर्फ इतनी है कि  ये देश मेरा और मैं इस देश का अभिमान हूं @ammazworld@gmail.com

तुम इतना क्यों करती हो??

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आप इसे podcast (Anchor) पर भी सुन सकते हैं ।   यहां जॉइंट फॅमिली में अपनी पत्नी के साथ समय बिताने के लिए तरसते समीर ने एक दिन चार पंक्तियों में रीमा से पूछ लिया  तुम इतना क्यों करती हो ? सिमटती दिनचर्या  तुम्हारी रात १२ बजे और फिर सुबह 6 बजे का अलार्म तुम्हे उठाता है  उसके बाद जो तुम शुरू होती हो एक पल के लिए ना तुम्हे कोई बैठाता है। क्यों करती हो तुम इतना जब हर करने का एहसान नहीं कोई चुकाता है? ऐसा क्या है परिवार के इन चार अच्छर में जो सब कुछ तुमसे करवाता है ? रीमा मुस्कुराई अलमारी का दरवाजा बंद कर बेड पर आराम से बैठने आयी ... थोड़ा और मुस्कुरायी... अपने लिए पति को चिंतित देख.. अपनी किस्मत पर इतराई.. तकिये को प्यार से उठाकर अपनी गोदी में लेते हुए पति के बगल में धमक कर बैठी और मन ही मन आज दिल की बात कह देती हूँ सोचते हुए बोली तेरी निशानियों से लदी माथे से पैरों की उँगलियों तक  सास ससुर की छत का एहसान मुझ पर  तेरे रहने से ही मेरा हर श्रृंगार है  तो कैसे ना करू मैं तेरी फिकर  ये समझाता मुझे आज का समाज है...

ट्रेंडी सी-सेक्शन...

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हे भगवान!क्या ज़माना आ गया है?आजकल की लड़कियों में तो दर्द सहने की छमता ही नहीं रही,  हमारे जमाने में हम घर का सारा काम भी करते थे, सास और पति के ताने भी सुनते थे और तब भी डिलीवरी के एक घंटे पहले तक काम ही कर रहे होते थे। पर आज की बहुएं तो प्रेगनेंट क्या हुईं अपने  पति को  उँगलियों पर नचाकर रखती हैं..... भगवान ही मालिक इस नई  पीढ़ी का, कहते हुए रुक्मा जी अपने कमरे में चली गयीं। ..  रुक्मा जी ये सारी बातें  ड्राइंग रूम में कह रही थीं पर उनकी बहु उपमा अपने कमरे में ही उन बातों को सुन सिसकियाँ भर रही थी। उपमा 7 महीने की प्रेगनेंट थी और पिछले हफ्ते के ही रूटीन चेक अप में उसकी गयनिकोलॉजिस्ट   ने कुछ कॉम्प्लीकेशन्स बताते हुए उसकी डिलीवरी   सिजेरियन ही होगी ऐसा कहा था। साथ ही बच्चा अभी से पेट में काफी नीचे है इसलिए बेड रेस्ट की सलाह दी थी।  इन बातों का रुक्मा जी को जबसे पता चला था तभी से उनका पारा चढ़ा हुआ था। जहाँ पहले बच्चे के आने की ख़ुशी होनी चाहिए थी वहां मात्र सिजेरियन की खबर ने पूरे परिवार में तनाव का माहौल पैदा कर दि...

यादें...

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