कपड़ो से नपते संस्कार..



"आहा..... माँ आज तो मैं बहुत ही उत्सुक हूँ मेरे स्केचेज़ प्रोजेक्ट के लिए सेलेक्ट हो गए हैं| आपको पता तो है मैं कितनी उम्मीदों के साथ यहाँ आयी थी" और अब माही का गला भर आया बोलते बोलते।
माँ- हां गुड्डो मुझे पता है मेरी बेटी बहुत ही लायक है एक दिन जरूर मेरा नाम रोशन करेगी और अब रोना नहीं सिर्फ आगे बढ़ना है तुझे चल अपनी तैयारी कर कहते हुए किरण ने फ़ोन रख दिया। 
किरण सुबह का काम समेटते हुए अपनी चाय लेकर बैठी और बेटी माही  की तरक्की में खुद को ढूंढने लगी। 20 साल पहले की किरण 
बहुत ही आशावादी नयी सोच से भरी हमेशा कुछ नया करने को आतुर जिंदगी में  बहुत मशहूर होने की ख्वाहिश रखती थी। किरण मुस्कुराती हुई मानो खुद की चाय की प्याली से ही बतियाने लगी ''मुझे पता है जिंदगी एक ही बार मिलती है और इसे मैं खुलकर जीना मेरा सपना है  मैं शादी के बाद ये करुँगी , वो करुँगी कहते कहते आँख भर आई किरण की" दरअसल किरण शादी के बाद अपने पारिवारिक जिम्मेदारियों में इस तरह उलझी की फिर उसके सपने ही बदल गए , समय की कमी उसकी उत्सुकता को मारती दिखी और फिर सबसे जरुरी परिवार का साथ जो उसे कभी नहीं मिला और उसकी सोच के लिए मिले  तो सिर्फ उलाहने एक वाक्या याद करते हुए किरण बोली काश मैंने आवाज़ उठायी होती और उसमें वो खोती चली गयी। 


बात उस समय की है जब किरण शादी करके आयी थी......
पति और परिवार पैसे से सम्पूर्ण थे, इसलिए किरण ने सोचा था कि पढ़े लिखे लोग हैं  मेरी भावनाओं को समझेंगे पर पहले ही दिन जब नहाकर किरण सूट पहनकर बहार आयी तो जेठानी ने टोक दिया हालांकि जेठानी खुद सूट ही पहनती पर किरण को यह तर्क दिया कि  "मैं 
शादी के 4 साल बाद से सूट पहन पायी हूँ " किरण ने कुछ न कहकर साड़ी और पल्ला दोनों को अपना लिया।  क्योंकि  उसे लगा धीरे धीरे वह यह सब बदल देगी। 
साल भर बाद किरण ने सोचा कुछ काम की नयी शुरुआत की जाए और फिर  बूटिक खोलने की सोची पति से चर्चा की तो पति मान
गए और भाभी से पूछने को कहा क्योंकि घर में उनका फैसला ही आखिरी था पर जैसे ही अन्य परिवार के लोगों को पता चला मानो उस दिन आफत आ गयी हो। 
जेठानी - हमारे घर की औरते गल्ला नहीं संभालती दुकान पर, और फिर कमी किस बात की है यहाँ,ना जाने कैसे कैसे लोग आएंगे ? ना जाने किस किस का नाप लेगी किस किस को नाप देगी छोटी बहु ये सब छोड़ो और बच्चे वच्चे की सोचो खुद बखुद समय न रहेगा फिर...
और फिर खुलने से पहले ही किरण के बूटीक पर ताला लग गया। 
किरण यूँ ही अपने सभी सपने लेकर कुड्ती रहती और यह चिड़चिड़ापन उसे परिवार से बहुत दूर ले जा रहा था। 
इसी बीच किरण को पहली बार  में ही जुड़वा बच्चे हुए  और उसका मातृतव का सफर मुश्किल हो गया फिर अपनी जिंदगी के 8 साल उसने बच्चो की परवरिश में ही बिता दिए। 

धीरे धीरे बच्चे बड़े हुए और किरण आत्मविश्वास से और ज्यादा भरी हुई थी क्योंकि अब बात सिर्फ उसकी नहीं थी उसकी बेटी के लिए भी वही बातें बनायीं जा रही थीं जैसे की लड़की है कपड़े टाँगे ढककर पहनाओ, तंग कपड़े न खरीदों जैसे कई बातें अब किरण को चुभने लगी थीं। परिवार में बेटी भी उसकी अकेली की ही थी जेठानी के 2 बेटे थे और उसके खुद जुड़वाँ बच्चो में एक बेटी एक बेटा था। बेटी माही भी किरण की तरह ही बहुत शौकीन थी। पिताजी ने माही के 15 वे  जन्मदिन के लिए एक बहुत बड़ी पार्टी रखी क्योंकि   इसके बाद माही को अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए विदेश की यूनिवर्सिटी से स्कॉलरशिप मिली थी और वह जाने वाली थी। 
माही थोड़ा मॉडर्न कपड़े पहनना पसंद करती थी और अब उसकी बड़ी माँ की बातों को न  किरण ज्यादा तवज्जो देती न माही। केक आया और बर्थडे गर्ल को बुलाने की बात हुई , माही  दुबली पतली लड़की 15 वर्ष की चुलबुले पन  से भरपूर एक सिंपल सी टीशर्ट और पेंसिल स्कर्ट पहनकर आयी।  माही इतनी प्यारी लग रही थी की उसके पिताजी ने गले लगाकर उसके माथे को चूम लिया। सारा फंक्शन अच्छे से पूरा हुआ पर जेठानी जी को माही की खुशियां रास ना आयी कुछ एक रिश्तेदार बचे थे सभी माही की तारीफ कर रहे थे इसी बीच उसकी बड़ी माँ बोल पड़ी " और सब तो ठीक है किरण पर तेरी बेटी ने  स्कर्ट पहन हमारे संस्कारों को धो दिया, अभी से इतनी छूट दे देगी तो विदेश से न लौटेगी ये और यहाँ अगर ये कपडे पहन रही है तो वहां क्या करेगी भगवान् ही मालिक"कहते हुए वह रुकी भी नहीं थी कि माही के पापा जो बेटी पर जान छिड़कते थे बोल पड़े......


भाभी माही आपकी भी कुछ है इस ख़ुशी के मौके पर दुवायें देने की बजाये आप....खैर छोड़िये आपकी बेटी नहीं है न इसलिए आप इन बातों को ना समझेगी।  घर में 3 लड़के और हैं, चारों बच्चों को एक सामान सुविधाएँ मिलती हैं पर यह मौका माही ने छोटी सी उम्र में अपनी मेहनत  से कमाया है। में शुक्रगुज़ार हूँ किरण का जिसने अपनी बेटी को इस काबिल बनाया और दुःख है मुझे इस बात का कि में क्यों नहीं समय पर किरण का साथ दे पाया। 
वहां मौजूद कुछ लोग बिलकुल सही बात कहते हुए अपनी अपनी बात रखने लगे। ..
किरण- भाभी स से ही स्कर्ट है और स से ही संस्कार और दोनों ही शब्दों का अपना अलग महत्व अपनी अलग जगह है। मेरी बेटी का स्कर्ट आपको उसके संस्कारों को कैसे बयां करता है ये मैं नहीं जानती पर हां उस स्कर्ट के साथ उसे अपने संस्कारों को कैसे पहनना है ये मेरी बेटी जानती है शायद इसलिए वह सर झुकाये आखों से आंसू टपकाते देखिये कैसे खड़ी है।
और अचानक डोर बेल बजी और किरण अपने ख्यालों से मुस्कुराते हुए दरवाज़ा खोलने के लिए उठी। उस हलकी मुस्कराहट में गर्व, सम्मान, हक और थोड़ी सी शिकायत थी।

@ammazworld

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