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जनवरी, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हां मैं भीड़ का किसान हूं....

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मुद्दा ये नहीं की मैं किसान हूं बात सिर्फ इतनी है कि  ये देश मेरा और मैं इस देश का अभिमान हूं मुद्दा ये नहीं की मेरी जीत हो बात सिर्फ इतनी है कि मेरी समझ से क्यों परे है मेरी ही बात हित की मुद्दा ये नहीं कि  सरकार अडिग है बात पर अपनी बात सिर्फ ये है  कि उन्हें हमसे ज्यादा हमारी परवाह क्यों इतनी मुद्दा ये नहीं की भीड़ है कुछ दिन कि छट जायेगी ही बात सिर्फ इतनी सी है  कि अब हर भीड़ में एक किसान है। मुद्दा ये नहीं कि मुद्दा सुलझने को तैयार नहीं, बात सिर्फ इतनी है कि सरकारी दहेज का वजन ना कम हो जाए कहीं। मुद्दा ये है  अब जीत की आगाज़ से शुरू आंदोलन का जीत से ही अंत होगा अनाज का मान बड़े अब यही हर किसान का अभिमान होगा। मुद्दा ये नहीं की मैं किसान हूं बात सिर्फ इतनी है कि  ये देश मेरा और मैं इस देश का अभिमान हूं @ammazworld@gmail.com

तुम इतना क्यों करती हो??

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आप इसे podcast (Anchor) पर भी सुन सकते हैं ।   यहां जॉइंट फॅमिली में अपनी पत्नी के साथ समय बिताने के लिए तरसते समीर ने एक दिन चार पंक्तियों में रीमा से पूछ लिया  तुम इतना क्यों करती हो ? सिमटती दिनचर्या  तुम्हारी रात १२ बजे और फिर सुबह 6 बजे का अलार्म तुम्हे उठाता है  उसके बाद जो तुम शुरू होती हो एक पल के लिए ना तुम्हे कोई बैठाता है। क्यों करती हो तुम इतना जब हर करने का एहसान नहीं कोई चुकाता है? ऐसा क्या है परिवार के इन चार अच्छर में जो सब कुछ तुमसे करवाता है ? रीमा मुस्कुराई अलमारी का दरवाजा बंद कर बेड पर आराम से बैठने आयी ... थोड़ा और मुस्कुरायी... अपने लिए पति को चिंतित देख.. अपनी किस्मत पर इतराई.. तकिये को प्यार से उठाकर अपनी गोदी में लेते हुए पति के बगल में धमक कर बैठी और मन ही मन आज दिल की बात कह देती हूँ सोचते हुए बोली तेरी निशानियों से लदी माथे से पैरों की उँगलियों तक  सास ससुर की छत का एहसान मुझ पर  तेरे रहने से ही मेरा हर श्रृंगार है  तो कैसे ना करू मैं तेरी फिकर  ये समझाता मुझे आज का समाज है...

ट्रेंडी सी-सेक्शन...

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हे भगवान!क्या ज़माना आ गया है?आजकल की लड़कियों में तो दर्द सहने की छमता ही नहीं रही,  हमारे जमाने में हम घर का सारा काम भी करते थे, सास और पति के ताने भी सुनते थे और तब भी डिलीवरी के एक घंटे पहले तक काम ही कर रहे होते थे। पर आज की बहुएं तो प्रेगनेंट क्या हुईं अपने  पति को  उँगलियों पर नचाकर रखती हैं..... भगवान ही मालिक इस नई  पीढ़ी का, कहते हुए रुक्मा जी अपने कमरे में चली गयीं। ..  रुक्मा जी ये सारी बातें  ड्राइंग रूम में कह रही थीं पर उनकी बहु उपमा अपने कमरे में ही उन बातों को सुन सिसकियाँ भर रही थी। उपमा 7 महीने की प्रेगनेंट थी और पिछले हफ्ते के ही रूटीन चेक अप में उसकी गयनिकोलॉजिस्ट   ने कुछ कॉम्प्लीकेशन्स बताते हुए उसकी डिलीवरी   सिजेरियन ही होगी ऐसा कहा था। साथ ही बच्चा अभी से पेट में काफी नीचे है इसलिए बेड रेस्ट की सलाह दी थी।  इन बातों का रुक्मा जी को जबसे पता चला था तभी से उनका पारा चढ़ा हुआ था। जहाँ पहले बच्चे के आने की ख़ुशी होनी चाहिए थी वहां मात्र सिजेरियन की खबर ने पूरे परिवार में तनाव का माहौल पैदा कर दि...

यादें...

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यादें

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बड़प्पन...

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रिश्तों की बुनियाद....

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दर्द...

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मैं सिर्फ मैं...

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रावण दहन...

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घर....

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कहां है मेरा घर?

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बराबरी...

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साथ...

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चाटुकारिता...

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तेरे प्यार की खुमारी

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प्यार...

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बेटियां...

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मन....

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रिश्ते...

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तुम्हारे बिना...

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मैं

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सबकुछ की मालकिन हूं बस तुम्हारे सिवा....

सिंदूर तेरा, समर्पण मेरा....

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शादी के बाद हम महिलाओं के श्रृंगार, अस्तित्व, और आज़ादी का एक प्रतीक बनता है हमारा सिंदूर। पर क्या होता है जब अल्पआयु या पत्नी से पहले पति का छोड़कर चले जाए, यह उस महिला के श्रृंगार, अस्तित्व, आज़ादी सभी पर एक कड़ा प्रहार करता है और हमारा समाज इस प्रहार को और तकलीफ देह बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ता, यही है मेरी कहानी चलिए पढ़ते हैं। सब कुछ विचलित करने वाला माहौल था, नैना किसी के काबू में आने को तैयार ही नहीं थी| आखों में आंसू कम और शशांक की छवि ज्यादा दिख रही थी। पूरा परिवार अपने दुःख को भुला कर नैना को समेटने की कोशिश कर रहा था। पर बिखरी हुई नैना को समेटना इतना आसान नहीं था। जिसके संग सात जन्मों का साथ था वह तो नैना को पहले जनम का अलविदा कह जा चुका था। बिखरे बाल, सूनी आँखें, उसके चेहरे की बुझी हुई आभा और बेरंग नैना को कोई देख नहीं पा रहा था। दो दिन पहले ही तीज का व्रत रख मेहंदी का श्रृंगार किया था शशांक के नाम का। आज अपने आप को कोसती नैना बार बार अपनी हथेलियों को जमीन पर घिस रही थी कि मानो अब ये श्रृंगार उसे कोस रहा हो। जिसकी भी तरफ नैना अपनी आस भरी नज़रों से देखती वह न...

औरतें भी खुश होती हैं क्या ?

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महिला और पुरुषों की सरंचना बिलकुल अलग है यह तो हम जानते ही हैं पर क्या आप जानते औरतें पुरुषों से ज्यादा खुश और संतुष्ट रहती हैं। ये मैं नहीं बल्कि , 160 देशों के लिए गैलप वर्ल्ड पोल द्वारा किये गए रिसर्च में पाया गया है। रिसर्च में यह कहा गया है कि औरतें मर्दों से ज्यादा खुश और संतुष्ट रहती हैं। ...अब रिसर्च है तो बात साबित भी है और हम भारतीय महिलाओं पर तो यह रिसर्च शत - प्रतिशत सही बैठती है। अगर कोई न्यूज़ रिपोर्टर माइक लेकर निकले और हम महिलाओं से पूछे की "आपको किस बात से ख़ुशी मिलती है "तो  जवाब क्या होगा?  इसी सवाल की तलाश में जब मैं निकली तो बात लंबी हो गयी और मन में न जाने कितनी उठा पटक शुरू हो गयी। ..जवाब की बेचैनी ने पहले तो खुद को ही आईने के सामने खड़ा कर सवाल कर लिया। ....जवाब समझ नहीं आया कि  आखिर कौन सी ऐसी बात है जो मुझे खुशियां देती है। ... शादी शुदा हूँ और पतिव्रता नारी भी,तो पहला ख्याल तो पति परमेश्वर का ही आया। .... क्योंकि शादी के बाद हम महिलाओं की  पूरी खुशियां परिवार के आसपास  घूमकर ही रह जाती है।   शाद...