सिंदूर तेरा, समर्पण मेरा....
शादी के बाद हम महिलाओं के श्रृंगार, अस्तित्व, और आज़ादी का एक प्रतीक बनता है हमारा सिंदूर। पर क्या होता है जब अल्पआयु या पत्नी से पहले पति का छोड़कर चले जाए, यह उस महिला के श्रृंगार, अस्तित्व, आज़ादी सभी पर एक कड़ा प्रहार करता है और हमारा समाज इस प्रहार को और तकलीफ देह बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ता, यही है मेरी कहानी चलिए पढ़ते हैं। सब कुछ विचलित करने वाला माहौल था, नैना किसी के काबू में आने को तैयार ही नहीं थी| आखों में आंसू कम और शशांक की छवि ज्यादा दिख रही थी। पूरा परिवार अपने दुःख को भुला कर नैना को समेटने की कोशिश कर रहा था। पर बिखरी हुई नैना को समेटना इतना आसान नहीं था। जिसके संग सात जन्मों का साथ था वह तो नैना को पहले जनम का अलविदा कह जा चुका था। बिखरे बाल, सूनी आँखें, उसके चेहरे की बुझी हुई आभा और बेरंग नैना को कोई देख नहीं पा रहा था। दो दिन पहले ही तीज का व्रत रख मेहंदी का श्रृंगार किया था शशांक के नाम का। आज अपने आप को कोसती नैना बार बार अपनी हथेलियों को जमीन पर घिस रही थी कि मानो अब ये श्रृंगार उसे कोस रहा हो। जिसकी भी तरफ नैना अपनी आस भरी नज़रों से देखती वह न...
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