हां हूं मैं लड़की तो क्या करूं मैं मर जाऊं?

आजकल "क्या करूं मैं मर जाऊं" बड़ा ट्रेंड कर रहा है,
पर हम औरतों की जिंदगी में तो ये हमेशा ही ट्रेंडिंग रहा..क्यों और कैसे ? चलिए सुनाते हैं...

हम लड़कियां पैदा होते ही दुनियादारी की आग में धकेल दी जाती हैं, ओह! लड़की पैदा हुई है "चलो कोई बात नही".... "लडकियां अपनी किस्मत लेकर आती हैं" बधाई हो । भई और सब तो ठीक है पर कोई ये बताए मुझे की क्या लड़के अपनी किस्मत बेचकर आते हैं? बस ये जो "चलो कोई बात नही" बोलते हुए जब गुप्ता चाचा गुजरते हैं तो मन खौल सा उठता है।
युद्ध यहीं खत्म नही होता उसके बाद तो असल में शुरू होता है।..."लड़की हो सुबह जल्दी उठा करो", "लड़की हो सलीके से रहा करो", "टाइम से घर आ जाया करो", "दुपट्टे को ढंग से लेकर बाहर जाया करो"।
    10वीं के बाद यादव जी की बेटी कौन सा सब्जेट लेगी ये भी पड़ोस के शर्मा जी तय करेंगे क्योंकि शर्मा जी का मानना है कि "लड़की को कोई महंगा कोर्स कराने की क्या जरूरत 4 _ 5 साल में इसे दूसरे घर ही तो जाना है" वैसे हां बात उनकी भी सही है आखिर जब पड़ लिखकर भी दहेज ढोकर  लड़की को ले ही जाना है तो उसकी पढ़ाई पर क्यों खर्चना? वो भी तर्क सही है, भले शर्मा जी के बेटे को डोनेशन दे देकर डिग्रियां मिली हों।
     वहीं जब शादी के लिए लड़का देखने आए तो लड़का हमें भले ही घूर घूर के देख रहा हो पर हमें नजरे झुकाए रखना है, बात नजर तक ही नही है मेरी अपनी रचनात्मकता उस लड़के के सवालों का जवाब देने में भले सक्षम हो पर मां और चाची के कहे अनुसार मुझे हर बात में उनकी बात पर मात्र हामी भरनी है, या यूं कहें कि इस एक झूठ भरी हामी के बोझ को शायद ताउम्र झेलना है, क्योंकि शादी के बाद जब आप विपरीत बोलती हैं तो पूरा ससुराल खड़ा हो जाता है आपके संस्कारों की लिखित परीक्षा लेने, क्योंकि जब वो मुझे देखने आए थे तब तो मैंने उन्हें अपना बड़ा भोला रूप दिखाया था, हालांकि दहेज की भरपूर मांग कर उन्होंने भले अपना असली रंग हमें पहले दिन ही दिखा दिया था पर लड़के वाले थे भई! लड़की वाले कैसे कुछ बोलते? समाज बिरादरी में नाक न काट जाती लड़की के मां बाप की।
      चलो हंसते रोते निभनी शुरू भी हुई दोनों पति पत्नी में तो सासू मां का ये चक्कर भी बड़ा अजब है गलती पूरे परिवार में किसी की भी हो माफी का ठिकरा भी बहु के सर ही फूटना यह प्रथा भी बड़ी गजब है। 
       सुबह का उठना पहला, हर काम का भोग पहला बहु ही लगाएगी, पर जब आराम करने की बारी आए तो बहु निठल्ली, कामचोर कहलाएगी। भई क्यों?
        मायके वाले ये बोल कर आजाद जिंदगी नहीं देते कि बेटा तेरा पति जैसे चाहेगा वैसे पहनना ओढ़ना और जब शौक पति के संग करना चाहो तो पति जिम्मेदारियों का दर्द व परिवार का रोना गाएगा।
        नौकरी तुम भी नहीं कर पाओगी क्योंकि तुम पहले से ही उस घर में महारानी कम नौकरानी बनकर आई हो फिर बच्चा पैदा कर प्रमोशन भी तो हो जाना है फिर तो कहीं ना आना ना कहीं जाना है।
         मानकर नसीब आगे तुम इसी कड़ी में बड़ जाती हो बस यही गलती अपने संग अपनी बेटी को भी सिखाती हो...
         जिंदगी भर की मोह माया में हो गई 50 पार तुम अब लगभग तुम खाली हो और मानती खुद को बेकार तुम,  
         अब न शौक बुटीक का पूरा हो पाएगा, पार्लर गर्ल बन भी गई तो तुमसे सर्विस कौन करवाएगा।
          बड़ी आमदनी घर में, पर वो सितारे वाली साड़ी पहनने की अब उम्र नहीं, कहेगा जमाना ये सोचकर तुम खुद ही कुड़ती रह गई।
           गजरा, लाल बिंदी खरीदने लायक बेटा हुआ तो अब तुम्हे पहनने का शौक नहीं, कुछ शर्म, कुछ हया, कुछ दुनियादारी का डर है अब बाकी कहो तो कुछ कॉम्प्रोमाइज करने की आदत जो है। 
           बची जिंदगी यही सोच लेकर कि कितना कुछ चाहती थी मैं करना और कुछ भी न कर पाई, एक ही जिंदगी मिली जिसे दिल भर के भी ना जी पाई।.....

क्यों इतनी पाबंदियां है लड़कियों पर, बहुओं पर, बच्चों की मांओं पर, उन ढलती उम्र की कमजोर महिलाओं पर। क्या उम्र उनके कपड़े, सलीके, तौर तरीके तय करती है या उनके अंदर का जसबा । वो चाहती है पुरुष वर्ग की इज्जत करते हुए आगे बढ़ाना पर वो कहीं आगे न निकल जाए आप इस बात से डरते हो , जलते हो।
  जिस समाज की दुहाई देकर आप उसे घर में कैद करते हो वो समाज तुम्हीं से बनता है, यह सोच समाज की नहीं तुम्हारी अपनी और तुम जैसे ना जाने कितने अकेलों की है बदलाव के लिए बस एक तुम बदलो अपनी पत्नी, बहन, मां और उस हर महिला को उसके हक का खुला आसमान दे दो...उसे भी जिंदगी एक ही बार मिली है बस यही एक बार सोच लो....

वरना इतनी बंदिशों में तो हर औरत यही सोचती है, कि हां हूं मैं औरत ! तो क्या करूं मैं मर जाऊं😔


@ammazworld ❤️

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