हां मैं ही मैं हूं...

दुनिया में हर किसी का अपना एक सफर होता है ये कहने की बातें हैं। आज भी हमारे देश का एक बड़ा तबका औरतों को आजादी महसूस करने नहीं देना चाहता। वो  उस तबके की औरतें कुछ लड़तीं हैं, कुछ भागती हैं ऐसे ही एक औरत के मन में भागने का ख्याल आया वो ये सोचती थी कि अन्य औरतों की जिंदगी मुझसे बेहतर है और इसी सोच के साथ अपने जानने वाली औरतों से जब खुलकर उसकी बातें हुईं तो उसे ये महसूस हुआ कि मैं अकेली नहीं बल्कि बंद दरवाजों की पीछे न जाने कितनी मैं हूं, देखा जाए तो बस मैं ही मैं हूं।
और पढ़िए क्या देखा उसने क्या महसूस किया और क्या बयां किया.....

मैं निकली थी कहीं अपनी तलाश में
छान - बीन में पता चला कि हर घर में एक मैं हूं।

हैरान परेशान खुद की तलाश में
हर मकान में लाचार जिंदा लाश एक मैं हूं।

रिश्तों में बंधी थी वो कहने को हजार
पर दिल से निभते रिश्तों को तरसती हर घर में मैं हूं।

लाई गई थी मायके से वो वादों संग हज़ार
पर झूठे वादों की ससुराल में सुनवाई हुई कहां 
अपने हक के लिए कहरती उस घर में मैं हूं।

वैसे तो लक्ष्मी नाम कईयों ने दिए थे
पर अपनी जरूरतों को सिसकती उस घर में मैं हूं

खुद को खोकर भी जीती देख आई मैं उसे
खुद के लिए तरसते उसके हर एक खयालात में मैं हूं।

उसके लिए लोगों की शिकायतें थीं हज़ार पार
और सिर्फ एहमियत की मारी वो उसके हर सबब में मैं हूं।

वो आज तक है चुप बदलाव की आस में
पर अंदर धधकती उसकी हर लौ में मैं हूं।

मैं चाह कर भी कर ना पाई खुद को उससे अलग
क्योंकि हर घर की औरत के उस दर्द में मै हूं।

@ammazworld



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