सिंदूर तेरा, समर्पण मेरा....
शादी के बाद हम महिलाओं के श्रृंगार, अस्तित्व, और आज़ादी का एक प्रतीक बनता है हमारा सिंदूर। पर क्या होता है जब अल्पआयु या पत्नी से पहले पति का छोड़कर चले जाए, यह उस महिला के श्रृंगार, अस्तित्व, आज़ादी सभी पर एक कड़ा प्रहार करता है और हमारा समाज इस प्रहार को और तकलीफ देह बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ता, यही है मेरी कहानी चलिए पढ़ते हैं।
सब कुछ विचलित करने वाला माहौल था, नैना किसी के काबू में आने को तैयार ही नहीं थी| आखों में आंसू कम और शशांक की छवि ज्यादा दिख रही थी। पूरा परिवार अपने दुःख को भुला कर नैना को समेटने की कोशिश कर रहा था। पर बिखरी हुई नैना को समेटना इतना आसान नहीं था। जिसके संग सात जन्मों का साथ था वह तो नैना को पहले जनम का अलविदा कह जा चुका था।
बिखरे बाल, सूनी आँखें, उसके चेहरे की बुझी हुई आभा और बेरंग नैना को कोई देख नहीं पा रहा था। दो दिन पहले ही तीज का व्रत रख मेहंदी का श्रृंगार किया था शशांक के नाम का। आज अपने आप को कोसती नैना बार बार अपनी हथेलियों को जमीन पर घिस रही थी कि मानो अब ये श्रृंगार उसे कोस रहा हो। जिसकी भी तरफ नैना अपनी आस भरी नज़रों से देखती वह नज़रे झुका लेता। क्योंकि अब कोई भी नैना की आस को पूरा नहीं कर सकता था।
शशांक के मृतक शरीर पर अपना सर पटकते पटकते ना जाने कितनी बार बेहोश हुई नैना और फिर चौंक कर उठती और कहती "मेरा सिंदूर तो देते जाओ मेरा सिंदूर तो दे दो"| बड़ी मुश्किल से वह कहर भरी शाम गुजरी। नैना की माँ सुनीता जी सुबह भी नैना के पलकों को जबरन बंद करतीं और नैना उन्हें खोल देती। रात भर उन जगती आंखों ने शशांक के आने का इंतज़ार किया। पर अफ़सोस की इस बार सभी की उम्मीदें नाकाम ही होनी थीं।
कुछ एक हफ्ते बाद लगभग सारे रिश्तेदार जो इस दुःख की घढ़ी में परिवार को हिम्मत देने आए थे वह सब जा चुके थे।
नैना एक ऐसी प्यारी सी खूबसूरत लड़की जिसे जिंदगी से ज्यादा उसे आज में जीना पसंद है। रंगों की शौकीन, खुशमिजाज, हिम्मती लड़की जिसके लिए परिवार सर्वोपरि है। परन्तु प्रकृति ने उसपर एक ऐसा कहर ढाया जिससे उसकी जिंदगी बदल गयी। शशांक नैना का पति जिसकी एक हफ्ते पहले ही सड़क दुर्घटना में मौत हो गयी थी। शशांक के माता - पिता अलग शहर में रहते थे। नैना बैंक में कार्यरत थी और उसी के ट्रांसफर की वजह से नैना और शशांक दिल्ली में रहते थे। दोनों का साथ कुछ दो सालों का ही था। दोनों ही आत्मनिर्भर और खूबसूरत जिंदगी जीने के शौकीन थे और जी भी रहे थे।
नैना "कहाँ चालू माँ? वहां जहाँ अब मेरा कुछ भी नहीं। आप ने और पापा ने तो मेरा कन्या दान कर दिया था| जिसे दान किया वो मुझे छोड़कर चला गया। मैं फिर से अगर तुम्हारे संग चलूँ तो मैं फिर से शुन्य पर चली जाऊंगी। एक बार शुरुआत की थी अब फिर से शुन्य से शुरुआत करने की हिम्मत नहीं माँ "|
नैना की सास "बेटा तू हमारे संग चल वहीं रहना अब तो तू ही हमारा शशांक है"।
नैना ,"जरूर चलती माँ अगर मैं शशांक के सपनों से अनजान होती| वह हमेशा से एक ऐसा छोटा सा प्ले स्कूल बनाना चाहता था जहाँ गरीब व लाचार बच्चे आकर पढ़ाई की शुरुआत कर सकें| शशांक ने बैंक में इस काम के नाम से अकाउंट खोल रखा था| हम दोनों हर माह अपने वेतन से कुछ पैसे जमा कर रहे थे। माँ मैं शशांक का वह सपना पूरा करना चाहती हूँ"।
माहेश्वरी जी, "बेटा यह तो तुम हमारे साथ रहकर भी कर ही सकती हो"।
नैना..."मैं जबसे ससुराल आयी मैंने आप सभी की हमेशा दिल से इज़्ज़त की पर ये घर मैंने और शशांक ने बड़े अरमानों से ख़रीदा और इसे संजोया। देखिये उस बिस्तर को जहाँ जिंदगी के खूबसूरत पल मुझे शशांक ने दिए। उस किचन में हम दोनों ने खड़े होकर एक दूजे में खोकर ना जाने कितनी बार खाना जला दिया होगा। वह मेरे घर का मंदिर जहाँ हमने हमेशा एक दूजे की खैरियत मांगी पर कहीं न कहीं शशांक की पूजा कबूल हुई और मेरी खारिज हो गयी। माँ ये हरे हरे पौधे शशांक को बहुत पसंद हैं मैं इन्हे मुरझाने कैसे दूँ। मेरे बैंक में बहुत बड़े पद पर देखना चाहता था मुझे शशांक, तो मैं उसकी ख्वाहिश को अधूरा कैसे छोड़ दूँ"?
सुनीता जी "बस कर बेटा तुझे जिसमें ख़ुशी मिले तू वही कर"|
माहेश्वरी जी को सुनीताजी ने समझाया कि अभी नैना बहुत जख्मी है, अभी किसी भी तरह की जबरदस्ती उसके लिए सही नहीं होगी|
महेश्वरीजी व पूरा परिवार सुनीताजी की बात से सहमत था और दोनों ने बारी बारी आकर नैना के साथ रहने का तय किया।
कुछ दो महीने बीत जाने के बाद नैना के ऑफिस की सहेलियों व परिवार से मिली हिम्मत से नैना ने फिर से ऑफिस जाने की शुरुआत की। सुबह के समय नैना तैयार हो रही थी। हलकी फिरोजी रंग की साड़ी पहनने के बाद नैना ने चेहरे पर हलकी सी क्रीम लगायी और सिंदूर दानी से एक चुटकी सिंदूर से अपनी मांग सजाई। वह लाल रंग नैना को आत्मविश्वास के साथ साथ शशांक के साथ का एहसास दे रहा था। नैना जैसे बाहर आयी। सुनीताजी "नैना बेटा यह क्या"??
नैना "क्या हुआ माँ"?
"बेटा अब तुम.... अब तुम ये सिंदूर न लगाओ बेटा। मैं तुम्हारी माँ हूँ समझ सकती हूँ, पर समाज क्या कहेगा"?
तब तक महेश्वरीजी भी आ गयीं "क्या हुआ सुनीता जी? नैना का सिंदूर न सिर्फ उसे बल्कि मुझे भी अपने बेटे के होने का एहसास दे रहा है| माना सिंदूर शशांक के नाम का है, पर इसके लिए सारा त्याग, अपनी खुशियों का दान तो अब अकेले नैना को करना पड़ रहा है। मैं तो इसके लिए अब कुछ नहीं कर सकती, पर अगर शशांक के नाम का सिंदूर इसे ख़ुशी देता है तो ये जरूर लगाए। समाज को मैं जवाब दूंगी"।
नैना ने परिवार की मदद और शशांक के सिंदूर के संग अपनी नयी शुरुआत की। कुछ एक हफ्ते बाद ही नैना की तबीयत बिगड़ी। सारे चेकअप्स के बाद पता चला नैना तीन माह की प्रेग्नेंट है। परिवार में खुशियां लौटीं और समय पूरा कर नैना ने एक बेटे को जन्म दिया।
हम औरतों की जिंदगी में सिंदूर, बिछिया, श्रृंगार हमेशा ख़ास रहा है। परन्तु यह हमेशा पति के नाम का रहा है और पति के न रहने पर इसके लिए हर जगह त्याग व बलिदान औरतों का ही होता है। अगर नैना की जिंदगी में शशांक का साथ नहीं तो क्या उसे शशांक से जुडी़ यादों के संग रहने का भी हक नहीं भले वह सिंदूर ही क्यों न हो?? मेरी सोच कहानी में है और आपकी? कॉमेंट करके जरूर बताइएगा।
ammazworld@gmail.com
हृदयस्पर्शी एवम मार्मिक रचना❤️👌
जवाब देंहटाएंShukriya dost❣️❣️
हटाएंमार्मिक कहानी एक नई सोच के साथ
जवाब देंहटाएंShukriya dost❤️❤️
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